काव्यपथ aTG

बे-नियाज़ी

Tushar Pandey

बे-नियाज़ी

इख़्तियार हो तो मैं कुछ ज़िक्र भी किया करूँ
चार दिन की ज़िंदगी इस पे क्यों गुमाँ करूँ..

है कहाँ वो शख़्स जो गाता था नग़्मे इश्क़ के
दफ़्न है मुझमें वो पर ये राज़ क्यों बयाँ करूँ..

होंगे मेरे बाद भी लाखों सुख़न-वर हुस्न के
नाज़नीनों पर भला फ़िर लफ़्ज़ क्यों ज़ियाँ करूँ..

छोड़ दें तन्हा अगर मुझको वफ़ा की चाहतें
चाहतों से फिर बता मैं क्यों कोई वफ़ा करूँ..

ढूँढता फिरता रहा जिसको बुतों में आदतन
पा लूँ वो महबूब गर, फिर क्यों भला सजदा करूँ..


इख़्तियार: अधिकार; वश में होना
ज़िक्र: उल्लेख; चर्चा
गुमाँ: घमंड; भ्रम
तन्हा: अकेला
वफ़ा: निष्ठा; सच्चाई
सुख़न-वर: कवि; वाक्पटु
नाज़नीन: सुंदरियाँ
ज़ियाँ: हानि; बर्बादी
बुतों: मूर्तियाँ
महबूब: प्रिय
सजदा: प्रणाम; झुकना
नग़्मे: गीत
दफ़्न: दफ़नाया हुआ
बयाँ: व्यक्त करना

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